खंभालीडा की शैल बौद्ध लेणीएँ

भादर नदी के तट पर सातवडा की छोटी पर्वतमाला है। इस पर्वतश्रेणी की गोद में खंभालीडा नामक सुंदर गाँव है। खंभालीडा राजकोट ज़िल्ले का गोंडल तहसील का गाँव है। लेकिन जेतपुर के पास है। खंभालीडा जूनागढ़ से 42 किमी. दूर, जेतपुर से 12 किमी. तथा राजकोट से 70 किमी. दूर है। सातवडा की छोटी-छोटी पहाड़ियों के बीच आभीरपल्ली (अहीरों का जंगल में बनाया हुआ झोंपड़ों वाला गाँव) जैसा सुंदर-सा खंभालीडा बसा है। तक़रीबन 450 की वस्ती वाले इस गाँव में पटेल और दलित बसे हैं।
यहाँ गुजरात की प्राचीन शिल्प धारण करने वाली एक मात्र शैल बौद्ध लेणीएँ हैं। इस ऐतिहासिक बौद्ध लेणी की खोज मुंबई राज्य के गुजरात प्रदेश के पुरातत्त्व विभाग के अध्यक्ष श्री पी. पी. पंडया ने 1959 के जुलाई महीने में की थी। यहाँ कुल 17 लेणीएँ थी। हाल में 15 लेणीएँ देखी जा सकती हैं। दो लेणीएँ मुख्य गुफ़ा के सामने स्थित पर्वतमाला में थी। जो जड़मूल से नष्ट हो चुकी है। ये लेणीएँ क्षत्रपकाल अर्थात् ई.स. 100 से 400 और चन्द्रगुप्त दूसरे ई.स. 375 से 414 के काल में नक्काशी गई थी। इसका मतलब यह हुआ कि ये तीसरी सदी के अंत और चौथी सदी के आरंभ में बनाई गई होगी। इस लेणी में चैत्यगृह, विशाल सभामंडप, विहार हैं। मुख्य तीन लेणी के बीच की लेणी के प्रवेशद्वार के दोनों तरफ़ मानवदेह की ऊँची बौधिसत्त्व अवलोकितेश्वर पद्मपाणी और अवलोकितेश्वर वज्रपाणी की अद्भुत प्रतिमाएँ नक्काशी गई हैं। जो गुजरात की शिल्प स्थापत्य कला की उत्तम कलाकृति है।


तीन लेणीएँ पूर्वाभिमुख हैं। ये लेणीएँ अपने अस्तित्व की अंतिम अवस्था से गुजर रही हैं। जिसमें से एक लेणी की छत संपूर्णता नष्ट हो चुकी है। दूसरी लेणी जर्जरित हो चुकी है। शेष 11 लेणीएँ उत्तराभिमुख हैं। मुख्य तीन लेणीओं के प्रवेशद्वार पर अद्भुत शिल्पकला की गई हैं। आज हम इन शिल्पकला के भावमुद्रा के अर्थ और सुंदरता की विस्तार से बात करेंगे। इन लेणीओं के भीतर चैत्य तथा ध्यान बैठक हैं।
प्रथम लेणी की दीवार को समय की मार लग चुकी है। वह गिर गई है। इस लेणी की लम्बाई 10 फुट, चौड़ाई 7 फुट तथा ऊँचाई 6 फुट है। लेणी के अंदर एक ताक़ है। जिसके अंदर धुँधली जर्जरित नक्काशी दिखाई देती है। वह अवलोकितेश्वर बुद्ध की होने की अनुभूति कराती है। लेणी के ठीक पीछे के भाग में एक गुफ़ा है जिसकी एक बाजू नष्ट हो चुकी है।
दूसरे नंबर की लेणी का कुछ हिस्सा अभी हुए मुसलाधार बरसात में गिर गया है। उसकी लम्बाई 12 फुट और चौड़ाई 7 फुट है। तीसरे नंबर की लेणी 7X6X7 फुट की है। इन लेणी के ताक़ में क्षीण बुद्ध की मूर्ति देखने को मिलती है। लेणी नंबर चार से गुफ़ा नंबर 8 तक साधारण तथा छोटी लेणीएँ हैं। जिसकी रचना तक़रीबन 10X8X6 फुट की है। लेणी नंबर 9 दक्षिणाभिमुख है। 10.5X8X7 फुट है। भीतर ध्यान बैठक है। जिसके बाहर की दीवार पर लाल रंग का त्रिशूल बनाकर किसी काल्पनिक देव की स्थापना करने का प्रयास किया गया है। 10 नंबर की लेणी विशाल है। भीतर चार स्तंभ हैं। लेणी के अंदर के आधे हिस्से में ऊँची विपश्य ना बैठक है। लेणी की लम्बाई 27 फुट, चौड़ाई 19 फुट और ऊँचाई 8.50 फुट है। लेणी के आरंभ में ऊपर के हिस्से की दोनों बाजू ऊँचाई पर ताक़ है। ताक़ में दीपक रखे जाते होंगे। सभामंडप जैसी लेणी की शुरुआत में दो चौरस स्तंभ पुरातत्त्व विभाग ने बनाए हैं। अंदर के दो स्तंभ मूल पत्थर के है लेकिन जीर्ण हो चुके हैं। 12 नंबर की लेणी सभामंडप जैसी विशाल है। उसके भीतर आठ कलात्मक गोलकार स्तंभ हैं। जिसमें से आगे के दो नष्ट हो चुके है। नष्ट हुए दोनों स्तंभ के टूटे हुए शेष भाग मूल जगह पर देखने को मिलते है। बाक़ी अंदर के दो स्तंभ को पुरातत्त्व विभाग ने नए बनाए हैं। लेणी की लम्बाई 28 फुट, चौड़ाई 20 फुट तथा ऊँचाई 7 फुट है। जिसके आगे के भाग में विशाल खुला मैदान है। समग्र गुफ़ाएँ एक झरने के किनारे स्थित हैं। झरना भादर नदी को मिलता है। बारिश का मौसम है। झरने में खल-खल करता पानी बह रहा है। सामने की पहाड़ी पर वनसमूह खीला है। झरने के किनारे का विशाल घना बोधिवृक्ष अपनी हरी-भरी छाँव को फ़ैला रहा है।
सभामंडप जैसी दोनों विशाल लेणी के बीच 11 नंबर की लेणी है। लेणी के प्रवेशद्वार के दाहनी तरफ़ पूर्ण क़द की अवलोकितेश्वर पद्मपाणी और बाई तरफ़ अवलोकितेश्वर वज्रपाणी बोधिसत्त्व की शृंगारित प्रतिमाएँ अलंकारित आकृति में नक्काशी गई है।


ऐतिहासिक संदर्भ को जांच करते समय पढ़ने में आता है कि चक्रवर्ती सम्राट अशोक के काल में पाटलीपुत्र में आयोजित धम्मदर्शन के तीसरी बौद्ध संगीति में हुए संवाद में हीनयान संप्रदाय की श्रेष्ठता साबित हुई थी। हीनयान संप्रदाय का प्रभाव गुजरात में सविशेष देखने को मिलता है। गुजरात में स्थित अत्यधिक बौद्ध लेणीएँ हीनयान बौद्ध संप्रदाय की हैं। पंरतु ढांक व खंभालीडा की बौद्ध गुफ़ाएँ महायान संप्रदाय की हैं। दोनों संप्रदाय के केन्द्र में मानव समाज के दुःख का अंत ही अंतिम लक्ष्य है, परंतु महायान में देवी-देवता, दिव्य जीव और मंत्र-तंत्र एवं रहस्यवाद को प्राधान्य दिया गया है। बुद्ध को देव मानते हैं। परिवर्तन और सुधार को अपनाकर अंतिम मोक्ष और अविनाशी तत्त्व को प्राप्त करने के लिए आध्यात्मिक यात्रा को महत्त्व देते है। जबकि हीनयान में बुद्ध गुरु, मार्गदर्शक, महापुरुष हैं किंतु अवतार या इश्वर नहीं हैं। अत: बुद्ध की पूजा नहीं की जाती है। हीनयान में बुद्ध के मार्गदर्शन में किसी बदलाव को अवकाश नहीं है इसलिए इसे रूढ़िवादी बुद्ध परम्परा कही जाती है। हीनयान में मानने वाले बौद्ध धर्म को उसके मूल स्वरूप में संभालकर रखना चाहते हैं। दोनों का प्रारंभ भारत में हुआ है। सम्राट अशोक के दसवें वारिस बृहदरथ की हत्या उसके ब्राह्मण सेनापति पृष्यमित्र शृंग द्वारा की गई थी। पृष्यमित्र शृंग द्वारा बौद्ध भिक्षुओं की भी हत्या की गई थी। भयभीत बौद्ध भिक्षु भारत छोड़कर अन्य पड़ोशी देश में चले गए थे। इस काल के दौरान महायान भारत की उत्तर तरफ़ फ़ैला हुआ था। चीन, जापान, ताइवान, कोरिया, भूटान, तिब्बत, सिंगापोर एवं मोंगोलिया में महायान पंथ का प्रभाव देखा जा सकता है। हीनयान एशिया के दक्षिण देशों में फ़ैला था। श्रीलंका, बर्मा, कंबोडिया, म्यानमार, थाईलेंड और लाओस में हीनयान का प्रभाव देखाई देता है।
यहाँ खंभालीडा में स्थित महायान संप्रदाय की शैल लेणी में अलंकृत पद्मपाणी और वज्रपाणी बौधिसत्त्व की प्रतिमाएँ नक्काशी गई देखी जा सकती हैं। समग्र गुजरात में स्थित अन्य बौद्ध गुफ़ाओं की तुलना में ये लेणीएँ स्थापत्य की दृष्टि से गुजरात की क्षत्रप तथा गुप्तकाल की अद्भुत विरासत हैं। खंभालीडा में मुख्य लेणी के प्रवेशद्वार के ऊपर दाहिनी बाजू पर अलंकृत नक्काशी की गई है। वह पद्मपाणी अवलोकितेश्वर की है। वह पुरुष है फिर भी उनकी शारीरिक रचना स्त्रियों जैसी दिखाई देती है। उसकी प्रतिमा शृंगारित है। उसको नर्तकी जैसी नक्काशी गई है। बौधिसत्त्व को सौन्दर्यपूर्ण तरीक़े से नक्काशी गई है। यहाँ जो प्रतिमा नक्काशी गई है उसके अंग को तीन स्थानों से शृंगारित अवस्था में बताया गया है। पद्मपाणी स्वरूप के गले, कमर और नितंब को कलात्मक रूप से मोड़ दिया गया है। एक हाथ में कमल का फूल धारण किया है। मस्तिष्क पर सजाया हुआ मुकुट, मुकुट के बाहर निकले खुले केश और सुंदर पृष्ट ठोढ़ी के साथ पूरी आकृति नर्तकी जैसी लगती है। अवलोकितेश्वर वो है जो स्वर्ग से समस्त विश्व पर अपनी कृपादृष्टि बरसाने वाले प्रभु। इसी तरह यहाँ बाई तरफ़ स्थित प्रतिमा अवलोकितेश्वर वज्रपाणी की है। जिसकी प्रतिमा भी पद्मपाणी स्वरूप से मिलती-झूलती है। इस मूर्ति के एक हाथ में वज्र है। जो बुद्ध की शक्ति का प्रतिक है। दोनों प्रतिमा के चित्रण अवस्था में भिक्षुओं का प्रयास रहा हैं कि वे बुद्ध का करुणामय रूप ही दर्शाए।
खंभालीडा की शैल लेणी की मुलाक़ात लेने आने वालों का नाम रजिस्टर में दर्ज किया जाता हैं। इस काम को करने के लिए पुरातत्त्व विभाग द्वारा गाँव के राजुभाई सागठिया की नियुक्ति की गई है। देखभाल का काम सरकार द्वारा आउट सोर्स को सौंपा गया है। लेणी से कुछ दूर बौद्ध केन्द्र बन रहा है। किसी कारणवश उसका काम बंद है। पास के कागवड गाँव में लेउवा पटेल की कुलदेवी खोडलमाता का भव्य खोडलधाम है। सातवडा की हरीभरी पर्वतश्रेणी के तट पर स्थित झरने के किनारे बहुत पुराने बौधिवृक्ष की घनी छाँव में सैंकड़ों वर्षों से खड़ी अवलोकितेश्वर की अमिदृष्टि कह रही है –
अत्त दीपो भव

मूल लेखक – निलेश काथड, जूनागढ़, गुजरात
दूरभाष: 9426169888
अनुवादक – डॉ. हेतल जी. चौहाण, सूरत, गुजरात
दूरभाष : 9979881118

Jay Bhim Namo Buddhay
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